अरबी जिसे घुइयाँ, कोचई, Colocasia esculenta आदि नामों से जाना जाता है, भारत में व्यापक रूप से उगाई जाने वाली कंद वाली सब्जी है। इसकी खेती खरीफ और जायद मौसम में सफलतापूर्वक की जाती है। इसकी जड़ आलू की तरह पकाई जाती है और पत्तियों से भाजी, पकौड़े एवं अन्य व्यंजन बनाए जाते हैं। अरबी के कंद स्टार्च से भरपूर होते हैं, वहीं पत्तियों में विटामिन A, कैल्शियम, फॉस्फोरस और आयरन अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं।
अरबी का पोषक महत्व (100 ग्राम में पोषक तत्व)
| पोषक तत्व | मात्रा |
|---|---|
| नमी | 37.10 ग्राम |
| वसा | 0.10 ग्राम |
| रेशा | 1.00 ग्राम |
| खनिज पदार्थ | 1.70 ग्राम |
| प्रोटीन | 3.00 ग्राम |
| लोहा | 1.70 मि.ग्रा. |
| पोटेशियम | 555 मि.ग्रा. |
| कार्बोहाइड्रेट | 21.10 ग्राम |
| विटामिन ‘ए’ | 400 आई.यू. |
| कैल्शियम | 40 मि.ग्रा. |
| सोडियम | 9 मि.ग्रा. |
अरबी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
अरबी की फसल को गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। यह फसल वर्षा और ग्रीष्म दोनों मौसमों में अच्छी तरह उगाई जा सकती है। खेत में पानी की निकासी सही होनी चाहिए क्योंकि जलभराव होने पर पौधों के सड़ने का खतरा रहता है।
भूमि की तैयारी
अरबी के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और 3–4 बार देशी हल चलाएं। इसके बाद 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं।
बुवाई का समय व विधि
- खरीफ मौसम: जून से 15 जुलाई तक।
- जायद मौसम: फरवरी–मार्च।
समतल क्यारियों में बुवाई: कतारों की दूरी 45 सेमी, पौधों की दूरी 30 सेमी और 5 सेमी गहराई पर कंद बोएं।
मेड़ बनाकर बुवाई: 45 सेमी दूरी पर मेड़ बनाकर दोनों किनारों पर 30 सेमी दूरी पर कंद लगाएं।
बीज की मात्रा एवं बीजोपचार
अरबी के लिए 8–10 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होते हैं। बीज कंदों को कार्बेन्डाजिम 12% या मेन्कोजेब 63% WP के घोल में 10 मिनट उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
फसल के लिए 25–30 टन गोबर की खाद, 100 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फॉस्फोरस और 80 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यक है।
- नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फॉस्फोरस-पोटाश पूरी मात्रा बुवाई के समय दें।
- बाकी नाइट्रोजन को 35–40 दिन व 70 दिन बाद टॉप ड्रेसिंग करें।
सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई
गर्मी में हर 6–7 दिन पर सिंचाई करें। वर्षा ऋतु में अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। खरपतवार नियंत्रण हेतु 2–3 बार निराई-गुड़ाई करना आवश्यक है। पौधों पर मिट्टी चढ़ाने से कंदों का विकास अच्छा होता है।
अरबी की उन्नत किस्में
- पंचमुखी, सफेद गौरिया, सहस्रमुखी, C-9, सलेक्शन
- इंदिरा अरबी-1 (छत्तीसगढ़)
- नरेंद्र अरबी-1 – अधिक उत्पादन वाली किस्म।
मुख्य रोग एवं कीट प्रबंधन
- लीफ ब्लाइट: डाइथेन एम-45 (0.2%) या ब्लाइटोक्स (0.3%) का छिड़काव करें।
- झुलसा रोग: कार्बेन्डाजिम + मेन्कोजेब (2 ग्राम/लीटर) का छिड़काव करें।
- कीट: माहू, सफेद मक्खी, लाल भृंग आदि के नियंत्रण हेतु डायमेथोएट या मेटासिस्टोक्स का छिड़काव करें।
खुदाई एवं उपज
अरबी की खुदाई बुवाई के 130–140 दिन बाद की जाती है, जब पत्तियां सूखने लगती हैं। उचित प्रबंधन से 300–400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
भंडारण
कंदों को हवादार और ठंडी जगह पर फैलाकर रखें। खराब कंदों को अलग करते रहें और बाजार भाव अच्छा मिलने पर शीघ्र बिक्री करें।
FAQs – अरबी की खेती से जुड़े सामान्य प्रश्न
Q1: अरबी की बुवाई कब करनी चाहिए?
अरबी की बुवाई खरीफ मौसम में जून से जुलाई और जायद मौसम में फरवरी–मार्च तक करनी चाहिए।
Q2: अरबी की फसल को कितने दिन में खुदाई के लिए तैयार किया जाता है?
बुवाई के लगभग 130–140 दिन बाद जब पत्तियां सूखने लगती हैं, तब अरबी की खुदाई की जाती है।
Q3: अरबी की खेती के लिए कौन सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?
अरबी की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी अच्छी हो, सबसे उपयुक्त होती है।
Q4: अरबी की प्रमुख उन्नत किस्में कौन-कौन सी हैं?
अरबी की प्रमुख किस्में पंचमुखी, सफेद गौरिया, सहस्रमुखी, सी-9, इंदिरा अरबी-1 और नरेंद्र अरबी-1 हैं।
Q5: अरबी की औसत उपज कितनी होती है?
वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने पर अरबी की औसत उपज 300–400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।



